पार्टी समर्थक
आम बनाम खास आदमी, राष्ट्रवाद, और आंदोलन पर चर्चा।
मेरे एक मित्र हैं। एकदम आत्ममुग्ध। किताबें पढ़ने का बहुत शौक है। थोड़ा बहुत लिख भी लेते हैं। हर बात में अपना एंगल निकालने की आदत है। उनके अनुसार भारत में आत्ममुग्धता को बहुत इज्जत मिलती है और पहले नंबर का आत्ममुग्ध व्यक्ति प्रधानमंत्री है। वह अपने आपको दूसरे नंबर पर मानते हैं और सोचते हैं उनके साथ भी जल्द ही कुछ बड़ा होने वाला है।
एक दिन बातों-बातों में उन्होंने कहा — “जानते हो, भारत में दो पार्टीयाँ हैं ?”
हम दोनों बैठ के क्रिकेट मैच देख रहे थे। राजनीति की कोई चर्चा थी भी नहीं।
मैंने कहा — “आपको बोलेंगे कि मैच के बाद ये सब बात करेंगे तो आप मानेंगे तो नहीं, बोलिए क्या बोल रहे हैं?”
“अबे देश की राजधानी में क्रांति हो रही है… छात्र सड़क पर आ गए हैं… और तुम्हे क्रिकेट की पड़ी है असंवेदनशील मानव !”
“अरे दादा! मूड मत ख़राब करो। बोलो, क्या बोल रहे थे?”
”मैंने कहा, भारत में दो पार्टियां हैं?”
“कुछ भी बकवास मत करो दादा। वो डेमोक्रैट और रिपब्लिकन टाइप अमेरिका में है। हमारे यहाँ हज़ारों पार्टियां होंगी।”
“वो लिखने के लिए है। वस्तुतः, भारत में दो पार्टियां हैं। एक पार्टी समर्थक, दूसरा पार्टी विरोधी। मौजूदा भारत में सभी पार्टियां एक ही पार्टी से परिभाषित होती हैं।”
मैंने मुस्कुरा कर कहा — “अरे दादा, नाम भी ले लो। पाप नहीं लगेगा।”
दादा ने गंभीर मुद्रा में कहा — “नहीं, लेखकों के लिए उसका नाम लेना वर्जित है। कुछ गलती से ऐसा-वैसा लिख दिया तो.. तो तुमको पता ही है… क्या हश्र होगा?”
फिर मुस्कुराकर बोले — “लेकिन जब आरती करनी हो तो लिख सकते हैं।”
दोनों खुल कर हंस दिए।
दादा फुल फॉर्म में थे। हम ऐसे मौकों के इंतज़ार में रहते थे, जब हमें उनसे ज्ञान मिलने का अवसर प्राप्त हो। दादा के वचन क्रिकेट मैच या फिल्मों से ज़्यादा मनोरंजक होते थे। मैंने टीवी का वॉल्यूम कम किया और बोला —
“दादा! लेकिन ये तो पहले भी हो चुका है न? यह कोई नयी बात तो नहीं है? जो पार्टी आज विपक्ष में है, एक समय पर सारी राजनीती उनके इर्द-गिर्द घूमती थी। आज पार्टी बदल गयी है। इसमें बड़ी बात क्या है?”
दादा न हैरान आँखों से मेरी और ऐसे देखा जैसे एक कोई वयस्क किसी अबोध शिशु को। फिर दोनों पैर को सोफे पर ऊपर कर पालथी मार ली। लम्बी सांस लेकर बोले —
“मतलब तुम कह रहे हो... पार्टी बदल गयी है… लेकिन हालात जस के तस हैं? जो बात चालीस वर्ष पहले हुई, वह आज भी हो रही है। तो ये बड़ी बात नहीं हुई?”
उनका ध्यान पैर के मोज़े पर था। शायद चावल का एक दाना चिपक गया था। उसको चुनते हुए वो बोले—
“पुराने पार्टी के समर्थक आज नयी पार्टी के घोर विरोधी हैं। और आज के पार्टी समर्थक पुराने के। लेकिन तुम अगर ध्यान से देखोगे तो दोनों के गुणों में कोई अंतर नहीं है। अलबत्ता पुरानी पार्टी से अधिकांश नेता नयी पार्टी में आ मिले हैं। लेकिन जनता कट्टर धड़ों में बँटी है। भाई! अगर वफादारी सीखनी है तो कोई भारतीय जनता से सीखे। नेता पार्टी के लिए वफादार नहीं हैं… पार्टी लोकतंत्र से ज़्यादा अपने एजेंडे को लेकर वफादार है…लेकिन जनता पार्टी को लेकर अब भी वफादार है।”
मैंने कहा — “बात तो सही कह रहे हो दादा। मेरे गाँव में एक चाचा हैं। लोकल ब्लॉक में काम करते हैं। दिन भर दफ्तर में घूस लेते हैं, ऑफिस का सामान उठाकर घर ले आते हैं। लेकिन व्हाट्सप एप फोटो में तिरंगा लगाते हैं एवं बायो में राष्ट्रवादी लिखते हैं।”
मैं रुका यह देखने के लिए, दादा सुन रहे थे कि नहीं। वो बोले — “हाँ..हाँ…और ?”
“विरोधी तो यहाँ तक कहते हैं, वह पार्टी समर्थक ही इसलिए हैं कि उन्हें पार्टी के पैरवी से नौकरी मिली है। पार्टी के लोकल छुटभैये नेता से वह व्हाट्सप्प ग्रुप पर संपर्क में हैं, जो उनकी पैरवी करते हैं। यह बात ही उनके लिए प्रमाण है कि वह देश निर्माण में सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं। छोटे भैया का बड़े भैया से सीधा संवाद होता है। और बड़े भैया ने कहा है, उनका भारत माता से सीधा कनेक्शन है। ये भी कोई बड़ी बात नहीं होगी, अगर हम कहें बड़े भैया भारत माता का ही मूर्त रूप हैं।”
मैंने पास पड़े चिप्स के कटोरे से एक चिप्स मुँह में डाला। चर्र-चर्र की आवाज़ आने लगी। दादा खीझ गए।
“अबे तुम कब से इतना ज्ञान देने लगे? यही है इस देश के बुर्जुआ वर्ग की समस्या। डाइनिंग टेबल पर ज्ञान बघारते रहते हैं।”
मैंने चुटकी ली — “दादा, ये बताओ। ये जो जंतर-मंतर पर प्रोटेस्ट हो रहा है, क्या लगता है आपको ? मतलब वो तीस-बत्तीस साल का लड़का बिना किसी पोलिटिकल बैकिंग के ही इतना बड़ा आंदोलन खड़ा कर दिया है? ”
दादा एकदम गंभीर होकर बोले —“अगर कल मेरे गाँव का रामखेलावन आ कर अचानक से जंतर-मंतर पर आ कर बैठ जाए तो तुम उसे कोई भाव दोगे? बेचारे रामखेलावन को तो ये भी नहीं मालूम होगा कि जंतर मंतर पर जाना कैसे है?”
उन्होंने हाथ बढ़ाकर चिप्स का एक टुकड़ा उठाया, मुंह में डाला और चबाते हुए बोले —
“अगर वो किसी तरीके से वहाँ बैठ भी गया, तो तुरंत अरेस्ट हो जाएगा। उठिये जी… आपका प्रदर्शन गैरकानूनी है। प्रदर्शन करने की भी एक प्रक्रिया है, आपने उसका पालन नहीं किया। उसके पास वकील के पैसे नहीं हैं। और वह इतना शिक्षित भी नहीं कि पढ़ कर न्यायिक प्रक्रिया या नियमों को समझ सके। उसे शिक्षित करने की जिम्मेदारी सरकार पर थी, जो उन्होंने किया नहीं। तो क्या इस लापरवाही के लिए सरकार के लोग जेल जाएंगे? और अगर उसने अपने खेत में ही आंदोलन किया, कौवा भी न पूछेगा उसे। चाहे वह फांसी ही लगा के क्यों न मर जाए।”
उनके मुंह पर चिप्स का मसाला लगा था, पोंछते हुए बोले —
“तो बाबू! लोकतंत्र सिर्फ कागज़ पर आम लोगों का है। लेकिन, असल में आम आदमी के अधिकार सिर्फ खास लोगों को ही मिलते हैं। अगर आंदोलन करने वाला अपनी मीडिया सपोर्ट, राजनीतिक सपोर्ट और लीगल सपोर्ट साथ ले के नहीं आया, तो सरकार उसको रत्ती भर भाव न दे। आंदोलन शुरू करने के लिए तो जयप्रकाश, वी पी सिंह, केजरीवाल या दीपके तो लगेंगे ही।”
“मतलब आप कह रहे हो कि आंदोलन में आम लोग होते ही नहीं हैं ?”
“शुरुआत खास लोगों से होती है, लेकिन वो बस इंजन है । जैसे पुराने रेल में ईंधन के लिए कोयला झोंका जाता था, आम आदमी वही है। आन्दोलनों का कोयला। आम आदमी लाठी खाकर और FIR में दर्ज़ होकर आंदोलन को बड़ा बनाता है।”
“दादा! हम आम और खास में फर्क कैसे करेंगे?”
“तुमने सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनल्स पर कवरेज देखे? आर्टिकल्स पढ़े?”
“हाँ। ”
“जो भी टीवी पर आकर इंटरव्यू ले और दे रहे हैं, वो खास हैं। आम आदमी तो बस रील में वायरल होने की सोच रहा है। या घर पर बैठ कर सोच रहा है, कहीं मेरे बच्चे कल आंदोलन में शामिल न हो जाएँ।”
“और सोशल मीडिया पर ?”
“जो आपबीती सुना या लिख रहा है, वो आम है। जो विवेचना या विश्लेषण कर रहा है, वह खास है।”
मैंने हँसते हुए कहा – “सत्य वचन दादा ! कोटि-कोटि प्रणाम आपकी बुद्धि को।”
दादा मुस्कुराते हुए बोले — “अरे,एक बात याद आया।”
कहते दादा ने दोनों हाथ ऊपर कर अंगड़ाई ली। बोले —
“मेरे पड़ोस में न, एक नया आदमी आया है रहने। शायद कोई बड़े लेवल का पार्टी कार्यकर्ता है। एक दिन मुझसे बोला — जानते हैं, ये जो विपक्षी पार्टी है, हमारी सरकार को ठीक से काम करने नहीं देती। विपक्ष तो पडोसी देश की कठपुतली है। उनको वोट देने वाले सारे लोग पडोसी देशों के घुसपैठिये हैं जो हमारी सरकार पर कब्ज़ा करना चाहते हैं।”
दादा — “मगर उनको वोट तो एक समय हमारे बाप-दादा ने ही दिया था? तो वो सब क्या राष्ट्रद्रोही थे?”
पड़ोसी — “अजी नहीं। उनको बहला-फुसलाकर वोट ले लिया करते थे। मीडिया पर सरकार का कब्ज़ा था, तो आम आदमी तक सही खबर पहुँच नहीं पाती थी। अब बहुत सारे चैनल हैं। अब तो हमारी निष्पक्ष मीडिया है, जो लगातार विपक्ष से सवाल करती रहती है। अन्यथा हमें इस बात का अंदाजा भी नहीं था कि सत्तर सालों विपक्षी पार्टी ने हमें किस खतरनाक स्थिति में ला दिया था।”
मैंने पूछा — “तो आपने क्या बोला ?”
दादा — “मैं क्या ही बोलता भाई? सच कहूँ तो ऐसे तर्कों का मेरे पास कोई जवाब नहीं है।”
मैंने हँसते हुए कहा — “मतलब, आपको भी अपना गुरु मिल ही गया दादा!”
दादा आगे बोले — “शाम को मैं घर पहुंचा। सुबह पत्नी से झगड़ कर निकला था। तीन महीने का बच्चा मेरी गोद में आते ही रोने लगा। मैंने अपने पड़ोसी वाला पैंतरा अपनाया। मैं तपाक से बोला — अपनी मम्मी की गोद में तो नहीं रो रहे थे तुम ? तुम ज़रूर अपने नाना-नानी के साथ मिल कर मेरे खानदान के खिलाफ षड़यंत्र कर रहे हो। बच्चे को मेरी बात में क्या दिखा, उसने अपने बिना दांत के मसूढ़े दिखा दिए और किलकारियाँ मारने लगा। मैंने पत्नी को बुला कर दिखाया और कहा — मैंने आपके और आपके मायके के षड़यंत्र का पर्दाफाश कर दिया है।”
मैंने हँसते हुए पूछा — “बाप रे! तो फिर? भाभी ने क्या कहा ?”
दादा — “तब से पत्नी ने मेरे मुँह लगना बंद कर दिया है।”
फिर दादा उठने को हुए। मैं भी उनके साथ उठा। चलते हुए दादा बोले — “यह बात मैंने पडोसी को बताई।”
पड़ोसी — “सही किया आपने। यकीन मानिये, चुप्पी साजिश का प्रमाण है।”
दादा और मैं, दोनों दरवाज़े के पास आ चुके थे।
अलविदा लेते हुए दादा बोले — “चलो भाई, कहानी खत्म। फिर बाद में बात होगी।”
इधर कुछ महीनों से दादा से मुलाकात नहीं हुई है। मेरे फ़ोन का भी कोई जवाब नहीं। एक तीसरे मित्र से पता चला है, अपने पड़ोसी की ऊँगली पकड़ कर उन्होंने भी पार्टी ज्वाइन कर ली है। पहले नंबर के आत्ममुग्ध का कार्यकाल खत्म होने के बाद शायद दूसरे नंबर का कुछ हो जाए।
दो दिन पहले मेरे घर के सामने के चौराहे पर एक बड़ा सा पोस्टर लगा है। प्रधानमंत्री का दौरा होने वाला है, उसके प्रचार के लिए। बड़े आदमकद साइज में प्रधानमंत्री की तस्वीर है। उसके साथ दो और मध्यम कद की तस्वीरें हैं — क्षेत्रीय नेताओं की। मैंने गौर से देखा तो बड़ी तस्वीर के पैरों के पास अनेक छोटी-छोटी तस्वीरों में दादा की एक तस्वीर है और उनका नाम स्वागतकर्ताओं की लम्बी लिस्ट में है।


बहुत खूब लिखा है ✨️🙌
भाई अगला कब आ रहे हो इधर? आओगे तो ज़रूर मिलूंगा और ऑटोग्राफ भी लूंगा।
इतना कसा हुआ व्यंग हिंदी में पढ़े हुए एक अरसा हो गया और इसे पढ़कर जो परसाई जी की याद आयी है खासकर के वो छोटे बच्चे के ननिहाल के षड़यंत्र का पर्दाफर्श वाली बात तो बहुत ही खूब थी।
बहुत बहुत आभार आपका यह लेख लिखने के लिए।