वात्सल्य का शिखर
From a father to their son and a man’s inability to express love
देखा मैंने तुम्हें पहली बार, उस मुंडेर के नीचे खड़ी। लाल सूट में चुपचाप – मेरी खिड़की की ओर ताकते। और जब मैं तुम्हें – नज़दीक से देखने की चाहत लिए, निकल आया कमरे से बाहर, तुम हड़बड़ा कर भागी अंदर। वर्षों चला ये सिलसिला, एक दिन तो तुम ठहर भी गई। देखा भी एक-दूसरे को जी भर, दोनों की आँखें पथराईं, होंठ पत्थर के – ज़रा हिले भी नहीं। कई बार मिलीं फिर तुम, शक्लें बदल-बदल के। कभी राह चलते, कभी किसी स्कूल के दरवाज़े से निकलती, तो किसी क्लास में मेरी बगल में बैठीं। और मैं अपनी ज़ुबाँ के पत्थर होने का, ग़म मनाता रहा। मन में तुम्हारी शक्ल बुनता रहा, देखा भी तो बस चोरी-चोरी, आँखें मिलने पर – शायद भेद न खुल जाए। फिर एक दिन आई तुम, पत्नी बन कर हमारे घर में। घर, जो तुम्हारे आने पर हमारा हुआ, जहाँ मैं बस एक किरायेदार था। मैं फिर भी पत्थर रहा, क्योंकि ज़ुबान बोलना भूल गई थी। फिर तुमने एक और रूप बदला, एक छोटे से आईने का। जिसे पहली बार उठाते – हाथ काँपे मेरे। जब गोल सा मुँह बनाकर, तुमने देखा एकटक मेरी आँखों में, सारा जमा पत्थर आँखों से बह निकला। गला रूंध गया, होंठ अब भी नहीं खुले। पर अब – शब्दों की ज़रुरत नहीं थी। प्रेम समझ आया – उस वात्सल्य के शिखर पर।


वाकई, पितृत्व में करुणा का वह भाव है जो कठोरतम हृदय को पिंघला देता है ।
Bahut hi pyari Kavita