रति और कामदेव का वैलेंटाइन
A comic take on love, globalization, and the market
कामदेव आज पूरी तैयारी में थे। कंधे पर गन्ने का धनुष, पीठ पर तरकश और तरकश में वही पाँच चिरंतन पुष्प-बाण। किंतु उनके मुखमंडल पर देवतुल्य तेज की जगह एक अजीब सी व्याकुलता थी। वे बार-बार अपने बाणों को झाड़-पोंछ रहे थे, जैसे कोई पुराना सेल्समैन अपनी एक्सपायर हो चुकी सामग्री देख रहा हो।
रति ने उनकी यह बेचैनी ताड़ ली। मंद मुस्कारते हुए पूछा— “क्या बात है स्वामी? आज वसंत की इस बेला में आप इतने भ्रमित क्यों हैं?”
कामदेव ने लंबी उसाँस भरी और पृथ्वी की ओर इशारा करते हुए बोले— “प्रिये! देखो, भूलोक में आज कोई विशेष दिवस है। हर ओर लाल रंग का सैलाब है, लोग एक-दूसरे को हृदय-चिह्न भेंट कर रहे हैं, पर कहीं मेरा ज़िक्र तक नहीं है! सब किसी ‘वैलेंटाइन’ को पुकार रहे हैं।”
रति का स्वर गंभीर हुआ, पर आँखों में चमक बनी रही— “महाराज, वह पश्चिम के संत हैं। वहाँ के प्रेम-विभाग के ब्रांड एंबेसडर हैं।”
“परंतु प्रिये! ये अचानक से पश्चिम के संत पूरब में कैसे? कुछ वर्षों पहले तक तो इनकी कोई सुगबुगाहट न थी।” कामदेव ने क्षुब्ध होकर पूछा।
रति ने पास आकर उनके कंधे पर हाथ रखा — “स्वामी, वैश्वीकरण ने पूरब और पश्चिम को साथ ला दिया है। तो अब देवताओं और संतों का भी आना हो रहा है।”
कामदेव की ललाट की रेखाएँ किन्तु कम न हुयी – “परन्तु, हमें तो कभी पश्चिम से बुलावा नहीं आया प्रिये? यह एकतरफा रीत क्यों ?”
रति ने दोनों बाहें कामदेव के गले में डाल दी – “महाराज! जैसे पानी ढलान की ओर बहता है, संस्कृति अब डॉलर की ओर बहती है। जो देवता जितना सामान बिकवा सके, उसकी ब्रांडिंग और पहुँच उतनी ही मजबूत। बाज़ार के संचालक पश्चिम में बैठे हैं और आर्यावर्त के लोग उत्साही उपभोक्ता हैं। जिस दिन रुपया डॉलर से ऊपर हो जाएगा, आप भी पश्चिम में प्रवेश कर जाइएगा।”
कामदेव ने हताशा में अपना तरकश एक ओर रख दिया — “तो क्या अब हमारे ये पंच-बाण व्यर्थ हो जाएंगे प्रिये ? क्या कोकिल-कंठ की कूक और मलय-समीर का कोई मूल्य नहीं रहा?”
रति ने शांत स्वर में कहा — “महाराज! जब तक प्रेम है, हम और आप रहेंगे। क्या हुआ अगर लोग आपके बाणों के बगैर प्रेम कर रहे हैं?
फिर रति की मृग नयनों में चंचलता आ गयी — “खैर, इन दार्शनिक बातों को छोड़िए स्वामी। जल्दी से मेरा ‘वैलेंटाइन गिफ्ट’ निकालिये।”
कामदेव ने अपने तरकश के पाँचो पुष्प-बाण निकालकर रति के हाथों में रख दिया।
दोनों एक दूसरे की आँखों में देख रहे थे। दोनों के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान थी।


अरविंद जी वैलेंटाइन के अवसर पर आपने जो खूबसूरत रचना प्रस्तुत की है वह लाजवाब है आपको बहुत-बहुत बधाई👌👍👏👏
वाह वाह बहुत खूब