सियासत
एक ग़ज़ल
मित्रों-मित्रों करके मुल्क में दरार डाली है। उन्होंने जम्हूरियत क्या खूब संभाली है।। तय था कि चौतरफा डंका बजेगा अपना। उन्होंने डंके की चोट ही हथिया ली है।। मौजूदा बदहाली पर दुहाई माज़ी की। बड़ी नायाब दूरबीन आँखों पर लगा ली है।। रोटी मांगो तो बदलते हैं नाम शहरों के। मुफ़लिसी कुछ इस तरह सुलझा ली है।। प्रतिरोध राजद्रोह है, सवाल बाग़ी है। डर के हमने भी उनकी तस्वीर लगा ली है।।
माज़ी — Past
मुफ़लिसी — Poverty

सशक्त भाषा शैली में लिखी प्रभावशाली रचना 👌👍👏👏