नई शुरुआत
कितना मुश्किल होता है, फिर से कुछ शुरू करना?
गैराज के कोने में पड़ी, पुरानी धूल खाती साइकिल, जिसके टायर में बरसों से हवा नहीं है। पूरी तरह बेकार भी नहीं, कि फेंकी जा सके। दिन, महीने, साल, शुक्रवार, शनिवार, इतवार, मिलकर भी, आधे घंटे नहीं निकाल पा रहे, साइकिल निकालने के लिए। जिम की मेंबरशिप, जिसके पैसे अकाउंट से कटते जा रहे, महीनों हो गए जिम गए हुए। अक्सर गुजरता हूं पास से, पर अंदर जाने की फुर्सत नहीं है। उसे कैंसिल भी नहीं करते, उम्मीद की गुलामी भी अजीब है। काश… काश…सब कुछ हर वक्त सिर्फ नया होता, पर जब कुछ नया आता है, कुछ और पुराना हो जाता है। गैराज भरा पड़ा है, पुराने सामानों से, जो फेंके भी नहीं जाते, पर बरसों से निकाले नहीं गए। मेरे मन के गैराज में कितने ही लोग पड़े हैं, सोचता हूँ कभी समय निकालकर उनसे मिल आऊंगा।


“उम्मीद की गुलामी भी अजीब है।”
काफ़ी अजीब :)
उम्मीद की गुलामी भी अजीब है।
This is beautiful line!!
Loved how you connected it with life at the end. It's lovely ❤