भाग्य और संस्कार के बीच
Note - This was written by a friend, who shared with me and requested to be shared on my substack page. Please show your love and support. ------------------------------------------------------------------------------------------------------ शब्द भी चुनाव है, और मौन भी। वाक्य भी चाल है, और भाव भी। कौन सही, कौन गलत— यहां भी चुनाव। कौन बचे, कौन टूटे— ये भी चुनाव। एक शब्द बचा, एक शब्द गया। यही तो जीवन है, यही चुनाव। कुर्सी भी चुनाव है, और सेवा भी। चेहरा भी चुनाव है, और इसे बदलना भी। भाग्य का भी हाथ, संस्कारों का भी। जो जिससे प्रभावित, वो उसी का रंग। चुनाव चलता रहता, हर दिन, हर क्षण। कौन कब बदला, कौन कहाँ चला। जो पड़े अचेत हैं, उन्हें क्या मिला ? क्या पाया उन्होंने, खोने से पता चला। खोजा जब भीतर, तो सच देखा। हर मोड़ पर, यहाँ भी चुनाव। वेदना रुकती नहीं, तोड़ देती है। औस्विच याद आता, जुल्म का चेहरा। नाज़ियों ने बनाई, मौत की फैक्ट्री। किसी को गैस मिली , किसी को गोली। किसी को भूख मिली , किसी को ठंड। चुनाव चलता रहा, रात-दिन वहाँ। चुनाव चलता रहता, रात-दिन यहाँ भी। रोकने की कोशिश , पर प्रवाह वही।

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