मैया से मम्मी तक
रिश्ते का शाब्दिक विकास
आज मैं मां को “मां” या “मम्मी” कहता हूँ। पहली बार किंतु “मां” नहीं “मैया” कहना सीखा था। पहली भाषा हिंदी नहीं, मगही थी। जब मैं पहली बार स्लेट और चौक लेकर प्राथमिक विद्यालय गया, छात्र से लेकर शिक्षक तक, सभी मगही बोलते थे। सवाल यह नहीं होता - “स्कूल जाना है?” बल्कि - “इस्कूल जैमही हो?”
घर के अंदर भी – “मां, भूख लगी है” नहीं, बल्कि – “मैया गे! भूख लगल हे।” ये भाषा बिल्कुल प्राकृतिक लगती थी। बोलने में कोई शर्म नहीं। गंवारपना का कोई तमगा नहीं।
पहली भाषा किसी स्कूल, किताब या शहर ने नहीं सिखाई। ये वो भाषा थी, जो मेरी मां-चाची बोलती। दादा-दादी बोलते। पूरा गांव बोलता। हिंदी बाहरी या शहर की भाषा थी।
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मेरी बचपन की सबसे बड़ी इच्छा थी – जूते पहन, टाई लगा, स्कूल बैग ले कर एक प्राइवेट स्कूल में पढ़ना।ये मेरे मन में कहाँ से आयी — यह कहना मुश्किल है। कुछ इच्छाएं उम्र की वजह से आती हैं, कुछ उस दौर की हैं, कुछ उस जगह या समाज की।
मेरा पहला स्कूल था — गांव का प्राथमिक विद्यालय। पैरों में चप्पल, कांधे पर गांधी झोला। जो मां ने पहना दिया, वही यूनिफॉर्म।
प्राथमिक विद्यालय पूरा हुआ नहीं था कि प्राइवेट स्कूल में स्थानांतरण हुआ। यूनिफॉर्म थी, पर टाई नहीं। टाई जीवन में पहली बार पहनी, जब पहली जॉब का ओरिएंटेशन था। उस दिन को सोच के हंसी आती है। मैं चंद लोगों में था, जिन्होंने टाई पहन रखी थी। उसके बाद ऑफिस कभी टाई पहन के नहीं गया।
नए स्कूल में जूते अनिवार्य नहीं थे। रोज़ पैदल दो तीन किलोमीटर दूर जाने के लिए चप्पल ही पैरों का साथी रहा। पर फिर भी खुश थे। अब खाली फर्श पर बैठना नहीं पड़ता था। चौकी थी बैठने के लिए।
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अगर आपको किसी परिवार या समाज को समझना हो, तो वहां के बच्चों से बात कीजिये। बच्चे में अगर एक रंग विशेष के लिए दुर्भावना है, वे किसी को छूने से कतरा रहे हैं, और बड़े सामान्य व्यवहार कर रहे हैं। प्रबल संभावना है, बड़ों ने एक मुखौटा ओढ़ रखा है।
नए स्कूल में मगही बोलने पर दूसरे बच्चे हंसने लगते - “हे हे! एकदम देहाती है।” हालांकि ये स्कूल गांव के लोकल मार्केट में ही था। परन्तु यह बात स्थापित हो चुकी थी, मगही गंवार देहातियों की भाषा है। हिंदी पढ़े लिखे शहरियों की।
बाल मन पर गहरा असर हुआ। पहली बार हिंदी बोलने का अनकहा दबाव आया। मैया से मां पर आया। हालाँकि यह परिवर्तन अचानक नहीं था। वर्षों तक हिंदी शब्दों के बीच मगही शब्द आ मिलते थे। और हिंदी शब्दों का मगही उच्चारण होता था।
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जब पटना में स्थाई रूप से रहना शुरू किया, आठवीं के बाद। आस पास के लोगों को मम्मी, मॉम कहते सुना। मैं भी प्रभावित हुआ। अब मां और मम्मी बराबर इस्तेमाल होने लगे।
जीवन के हर अनुभव के बाद लगा है, मैं अब तक कुएं का मेंढक रहा हूं। कई बार कुछ पल ऐसा लगा है कि अबकी शायद कुएं से बाहर आ गया। फिर अगले ही क्षण लगता है, बस छोटे कुएं से थोड़े बड़े कुएं में आ गया।
प्राइवेट स्कूल में ज्यादा पढ़ा नहीं। हाई स्कूल तक सरकारी विद्यालयों में पढ़ा। शिखर के विद्यार्थियों में रहा। कुछ हद तक अच्छे विद्यार्थी होने का दंभ भी था। परन्तु कॉलेज ने फिर से उसी दोराहे पर ला खड़ा किया। अंग्रेज़ी एक नए वर्ग के रूप में आया। हालांकि इस बार बच्चे नहीं थे, जो सीधे मुंह पर देहाती बोल देते।
अंग्रेज़ी बोलने वालों के स्वर में आत्म मुग्धता और हिंदी वालों का अलग किनारे बैठ जाना — या पर्सनैलिटी डेवलपमेंट के क्लास में आँखें चुराना — इस वर्गभेद को साफ दर्शाता था।
किंतु, इस बार डर सिर्फ देहातीपने का नहीं था। यहाँ से यह तय होना था कि किसे नौकरी मिलेगी, किसे नहीं। किसी छोटे शहर के छोटे से कॉलेज में हम शैक्षणिक उत्कृष्टता हासिल नहीं करने जा रहे थे। औसत विद्यार्थी को अगर औसत अंग्रेजी भी नहीं आती, तो जीवन की राह कठिन होने वाली थी।
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जीवन में आगे चलकर यह ज्ञात हुआ कि यह एक चक्र है। यह चलता रहेगा। भले ही आज मैंने अंग्रेजी सीख ली है। अब बहस उच्चारण पर आ गई है। आप का अंग्रेजी बोलने का लहजा कैसा है?
कल ये बहस शायद किसी और बात पर होगी।
पर, मेरे अंदर का छोटा बच्चा अब परेशान होना बंद हो गया है। अब मैं “मां”, “माई”, “मैया”, “मम्मी” निःसंकोच कह लेता हूँ। शायद मुझे मैं क्या कर रहा हूँ, इससे ज़्यादा फर्क नहीं पड़ता। क्योंकि जवाब में वही पुरानी आवाज़ कानों में पड़ती है – “हाँ बेटा !”
परन्तु मेरे न चाहने पर भी, कभी-कभी मुझ में एक भाषा विशेष को अच्छे से पढ़, लिख, बोल पाने का दंभ आ जाता है।


Bahut sahi chiz ko pakda is ank mein. Humein jo aata h veh bekar h, isko baar baar yaad dilaya jata h. Bas koi yeh nhi btaya ki jo tumhe aata h veh bhi theek h, hum bs tumhe ek aur tareeka bta rhe hain jisse tum aur logon tk apni baat pahuncha paoge. Aise koi btata to shayad Bina Sharm k seekhte
अरविंद जी मां के गर्भ में रहकर बच्चा जिस भाषा को सुनता है. वह रक्त के साथ इसकी रगों में प्रवाहित होती है. उसे सीखने के लिए कभी भी प्रयास नहीं करना पड़ता वह सहज रूप से हमारे जीवन का अभिन्न अंग बन जाती है किंतु अन्य भाषाओं को सिखाने में अच्छी खासी में मशक्कत करनी पड़ती है यही तो मातृभाषा की महिमा है. सुंदर रचना के लिए बधाई🙏👌👍👏