आधी पढ़ी किताबें
क्या कभी आधी पढ़ी किताबें भी पढ़ी जायेंगी?
एक लाइब्रेरी में रखीं अनेक किताबें। कई अत्यधिक लोकप्रिय, जो हर सप्ताह किसी के हाथों में होती हैं। अब जीर्ण हो चुकी हैं, जो इस बात का प्रमाण है, कितनों का जीवन छुआ है उसने। और कई पड़ी कोने में सालों से – सही-सलामत लेकिन ऊपर गर्द की एक परत पड़ी। कुछ आधी पढ़ी, कुछ कभी खोली ही नहीं गयीं। रखीं तो थी पढ़ने के लिए, लेकिन सिर्फ गिनती के लिए रह गईं। मैं अक्सर मिलता हूं लोगों से, सूट-बूट टाई में टिप टॉप हर वक्त, चेहरे पर कोई खुरदरापन नहीं, एकदम सपाट, जैसे कोई धूल की परत। क्या कभी आधी पढ़ी किताबें भी पढ़ी जायेंगी?

Kya baat hai Arvind babu badi hi gehri baat Kari hai mazaa aa gaya thanks for Iinspiring aise hi likhte raho humko asla barood milta rehta hai
“क्या कभी आधी पढ़ी किताबें भी पढ़ी जायेंगी?” - यह सवाल मेरे मन में उतर गया।
हम कितनी चीज़ों को अधूरा छोड़ देते हैं, और फिर उन अधूरे अनुभवों की धूल से रोज़ गुजरते हैं।
लिखने का अंदाज़ बहुत कोमल और ध्यानशील लगा।