गदर्भ तंत्र
In Unison We Bray — "Dhenchu! Dhenchu!!"
गदर्भ समाज में एक नए युग का सूत्रपात हुआ था, एक नए शिशु के जन्म के साथ। माता-पिता की खुशियाँ सातवें आसमान को छू रही थीं। समाज के काफी गणमान्य गदर्भ आज उनसे मिलकर बधाई देने आए थे। सबने उम्मीद जताई थी कि नया शिशु गदर्भता को नई ऊँचाई पर ले जाएगा और माता-पिता के जैसा ही महान गदहा बनेगा।
हर्षोल्लास और धूमधाम से उसका नामकरण हुआ – मूढ़।
मूढ़ की प्रारंभिक शिक्षा माता-पिता और अनुभवी गदर्भ शिक्षकों की देखरेख में शुरू हुई। उसे गदर्भ समाज के नियम, रीति-रिवाज और परंपरागत ज्ञान सिखाए गए। उसे गदर्भ समाज के गौरवशाली अतीत के बारे में बताया गया। कहा गया कि गदर्भ कैसे विश्वगुरु हुआ करते थे। कई गणमान्य गदर्भों ने उसकी पीठ थपथपाते हुए कहा – “मूढ़ को वापस उनके विश्वगुरु होने में योगदान देना है।”
उसे सिखाया गया कि अन्य गदर्भों पर श्रेष्ठता कैसे बनाए रखनी है। अपनी नस्ल की शुद्धता बनाए रखनी है और माता-पिता की पसंदीदा गदही से विवाह करना ही उसका पुत्र धर्म है।
मूढ़, नाम के विपरीत गुण का निकला – कुशाग्र बुद्धि का स्वामी। वह अक्सर कक्षा में प्रश्न करता –
“अगर हम विश्वगुरु थे, तो आज क्यों नहीं हैं?”
“हम आखिरी बार कब विश्वगुरु थे?”
“जब हम विश्वगुरु थे, हमने वह बढ़त बनाए क्यों नहीं रखी? क्या हमारी कुछ पीढ़ियाँ आलसी भी थीं, जिन्होंने यह बढ़त गँवा दी?”
“क्या सारे गदर्भ श्रेष्ठ हैं, या बस हमारी नस्ल? वे भी जो माता-पिता का धन खाते हैं और दिनभर पेड़ के नीचे पड़े रहते हैं? जो दिनों-दिन स्थूल होते जा रहे हैं?”
“मैंने विकासवाद का सिद्धांत पढ़ा है। उसके अनुसार सारे गदर्भों की उत्पत्ति समान पूर्वजों से हुई है। फिर कोई किसी और से श्रेष्ठ कैसे है? फिर नस्ल की शुद्धता का क्या तात्पर्य रह जाता है?”
आदि-आदि।
यह बात उसके माता-पिता के लिए चिंता का विषय थी। समाज के सम्मानित व्यक्तियों से तर्क करना, कक्षा में जटिल प्रश्न करना – गदर्भ समाज में असभ्य माना जाता था। वर्षों से उसके माता-पिता ने समाज के लोगों के सुर में सुर मिलाकर “ढेंचू-ढेंचू” ही बोला था। आज मूढ़ उनकी इस छवि पर दाग लगाने पर उतारू था।
मूढ़ अन्य प्राणियों से घुलना-मिलना पसंद करता था, चाहे किसी भी नस्ल के हों। वह अक्सर पाठशाला में अपने सहपाठियों संग भोजन साझा करता – वे सहपाठी जिनसे माता-पिता ने दूर रहने को कहा था।
“वे नीची नस्ल के हैं। हमारे घरों में नौकरी करते हैं। अपनी नस्ल और हैसियत के मित्र बनाओ।”
मूढ़ को लगता – “परन्तु वे तो मुझसे अच्छे से पेश आते हैं। मैं उनसे रुखाई कैसे बरतूँ? उलट, प्रतिष्ठित घरों के गदर्भ बालक मुझसे खराब व्यवहार करते हैं। कहकर – मैं गदर्भ समाज के लायक नहीं हूँ।”
मूढ़ की प्रारम्भिक शिक्षा समाप्त हुई। संयोगवश, उसे शहर के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में प्रवेश मिल गया।
मूढ़ ने सोचा था, अब वह गाँव के बड़ों और माता-पिता की छाया से बाहर निकलेगा। कुछ ही दिनों में उसका यह विचार गलत साबित हुआ। यहाँ भी उसे वही बातें सुनने को मिलीं। छात्रों, प्रोफेसर व अन्य कर्मचारियों में उसे अपना गाँव ही नज़र आया।
मगर, एक छोटा भिन्न तबका था – कुछ छात्रों और प्रोफेसरों का – जो सवाल पूछने को प्रेरित करते थे। यह वर्ग अक्सर कॉलेज, प्रशासन और समाज की आँखों की किरकिरी बना रहता।
मूढ़ को कई गदर्भों ने चेतावनी दी –
“अराजकतावादी हैं सब।”
“राज्य-विरोधी हैं।”
“दूर रहो उनसे।”
परन्तु मूढ़ का खिंचाव उनकी तरफ ही था। मूढ़ अक्सर उनके साथ समय व्यतीत करता, वाद-विवाद में भाग लेता और पुस्तकालय में काफी समय बिताने लगा। उसकी तर्क क्षमता और तीव्र हुई। उसने समझा – अपने अधिकारों के लिए लड़ना व समाज को जागरूक बनाना उसका कर्तव्य है। वह सभाओं में, कॉलेज के गलियारों में, हर जगह प्रचार करने लगा –
“गदर्भों में भी विवेक है, तर्क क्षमता है, और वे अपने अधिकारों के लिए लड़ सकते हैं। उन्हें हर बात पर ‘ढेंचू-ढेंचू’ करने की आवश्यकता नहीं है।”
धीरे-धीरे मूढ़ सबकी आँख का काँटा बन गया।
एक बार, जब वह एक सभा में भाषण दे रहा था, भीड़ ने उस पर हमला किया और उसके कमरे में तोड़फोड़ की।
“यह समाज-विरोधी हरकतें बंद करो। आखिरी चेतावनी दे रहे हैं।”
माता-पिता का पत्र उसे मिला –
“बेटा! हमने बड़ी मुश्किल से समाज में अपने लिए स्थान बनाया है। तुम्हारी इन हरकतों से हमें नीची नज़रों से देखा जाने लगा है। ग्राम-प्रधान ने हमें समाज-निष्कासन की चेतावनी दी है। हमारे लिए और मुसीबत खड़ी मत करो। चुपचाप ‘ढेंचू-ढेंचू’ करना सीख लो।”
आहत होकर, वह स्थानीय थाने गया। उसने रिपोर्ट दर्ज कराने का प्रयास किया।
“इंस्पेक्टर साहब, आप कानून द्वारा हमारी सुरक्षा के लिए नियुक्त किए गए हैं। कृपया उन लोगों को दंडित करें और मेरे अधिकारों की रक्षा करें।”
इंस्पेक्टर ने कहा – “ढेंचू-ढेंचू! मूढ़ महोदय! आप पर अराजकता फैलाने और लोगों को उकसाने का आरोप है।”
फिर उसने सिपाही को आदेश दिया – “इन्हें हवालात में बंद करो। अपने सारे उपायों का प्रयोग तब तक करो, जब तक ये सिर्फ ‘ढेंचू-ढेंचू’ बोलना न सीख जाएँ।”
मूढ़ ने प्रतिरोध जताया – “मगर यह तो कानून के विरुद्ध है।”
थानेदार ने कहा – “हमारा काम शांति-व्यवस्था बनाए रखना है। जब सब लोग सिर्फ ‘ढेंचू-ढेंचू’ बोलेंगे, हमें आसानी होगी।”
मूढ़ को कई दिनों तक हवालात में यंत्रणा का शिकार होना पड़ा। जब वह बाहर आया तो शारीरिक रूप से काफी कमज़ोर हो चुका था, पर उसने हिम्मत नहीं हारी।
वह अपने स्थानीय विधायक के पास गया और गुहार लगाई –
“विधायक महोदय, आप संसद में हमारी आवाज़ उठाने के लिए चुने गए हैं। कृपया स्थानीय कानून प्रवर्तन को हस्तक्षेप करने का निर्देश दें।”
विधायक जी बोले – “ढेंचू-ढेंचू! देखिए – ‘ढेंचू-ढेंचू’ करने वाले संख्या में बहुत ज़्यादा हैं। तर्कवादी एक अल्पसंख्यक समुदाय है। अगर हम तर्कवाद का साथ देंगे तो चुनाव में नुकसान होगा। आप क्यों नहीं ‘ढेंचू-ढेंचू’ बोलना सीख लेते हैं? आप भी बहुसंख्यक का हिस्सा बन जाएँगे।”
मूढ़ ने कहा – “किन्तु इससे तो समाज का विकास रुक जाएगा। अगर सब एक जैसा बोलने और सोचने लगे, सदियों पुरानी सोच नहीं बदलेगी। तो फिर हम तकनीक और आधुनिकता को कैसे अपनाएँगे?”
विधायक जी बोले – “देखिए – ‘ढेंचू-ढेंचू’ करने वाले हमें आसानी से वोट दे देते हैं। तर्कवादी हमसे जवाबदेही की माँग करते हैं। वे जनता को हमारे विरुद्ध भड़काते हैं। हम आपका समर्थन नहीं कर सकते। आप जब तक ‘ढेंचू-ढेंचू’ करना नहीं सीख लेते, आगे से हमारे पास गुहार लेकर मत आइएगा।”
हताश होकर मूढ़ ने मुख्यमंत्री को पत्र लिखा –
“माननीय मुख्यमंत्री महोदय! आप हमारे समाज के मुखिया हैं। कृपया एक उदाहरण स्थापित करें कि लोग आपके राज्य में सुरक्षित हैं और अपने विचारों को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं।”
कई महीनों के बाद उत्तर आया –
“ढेंचू-ढेंचू! महोदय! हम एक बड़े राज्य का संचालन करते हैं। हम जनता के अनुसार चलते हैं, कुछ गदर्भों के अनुसार नहीं। जनता का विचार है कि आप ‘ढेंचू-ढेंचू’ करना सीख लें। ऐसा करते ही आप स्वयं को सुरक्षित महसूस करने लगेंगे।”
मूढ़ ने वापस पत्र लिखा –
“परन्तु महोदय, यह तो व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर हमला है। आज लोग ‘ढेंचू-ढेंचू’ न बोलने पर मुझे निशाना बना रहे हैं। कल ये मुझ पर इस बात का दबाव बनाएँगे कि मुझे क्या खाना है, क्या पहनना है।”
मूढ़ को इस बार पुलिस विभाग का एक पत्र मिला –
“महोदय, आप राज्य के अधिकारियों और जन-प्रतिनिधियों का समय नष्ट कर रहे हैं। अगर आपके इस व्यवहार में बदलाव नहीं आया तो हमें आपको फिर से हवालात में बंद करना पड़ेगा।”
मूढ़ अब पूरी तरह से हताश हो चुका था। बुझे मन से उसने अदालत में अपील की –
“न्यायाधीश महोदय, आप हमारे अधिकारों की रक्षा के लिए यहाँ हैं। कृपया उन लोगों को दंडित करें जिन्होंने मुझ पर हमला किया।”
न्यायाधीश ने आदेश दिया –
“ढेंचू-ढेंचू! महोदय, आपके विरुद्ध कई शिकायतें हैं। आप अपने आचरण में अविलम्ब बदलाव लाएँ और अदालत का समय बर्बाद करना बंद करें। तर्कवादियों के उकसावे के कारण अदालतों के काम बढ़े हुए हैं। अगर आप ‘ढेंचू-ढेंचू’ करना सीख लें तो अदालतों में त्वरित कार्रवाई होगी।”
मूढ़ अब अपना आपा खो बैठा। उसने एक विशाल सभा का आयोजन किया। उसने शहर के सभी नागरिकों को संबोधित किया –
“मित्रों! हर पीढ़ी का कर्त्तव्य है, अपनी पुरानी पीढ़ी से बेहतर करना – सोच में, व्यवहार में। आने वाली नस्लों के लिए बेहतर समाज का निर्माण करना। अपने से कमज़ोर की बात आगे बढ़ाना। अधिकारियों व जन-प्रतिनिधियों से प्रश्न करना। मित्रों-सहपाठियों में स्वस्थ वाद-विवाद को बढ़ावा देना। किसी भी बात को मानने से पहले अपने विवेक से तौलना।”
उसने बात आगे बढ़ाते हुए कहा –
“हम अपने विचार व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र हैं। यह अधिकार हमें संविधान देता है। लेकिन भीड़ से लेकर पुलिस, विधायक, न्यायाधीश, मुख्यमंत्री– सभी चाहते हैं कि हम केवल ‘ढेंचू-ढेंचू’ बोलें और अपने विवेक का प्रयोग न करें। हमें अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकजुट होना चाहिए और इस तंत्र को बदलना चाहिए। मित्रों, कृपया मेरा साथ दें!”
भीड़ को यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई। नगर के लोगों ने एक साथ चिल्लाना शुरू किया –
“ढेंचू-ढेंचू! ढेंचू-ढेंचू! ढेंचू-ढेंचू! ढेंचू-ढेंचू!”
उनकी आवाज़ नगर में ऐसे गूँज रही थी जैसे बादल गरज रहे हों। कई गदर्भ सड़कों पर “ढेंचू-ढेंचू” चिल्लाते हुए निकल आए। तर्कवादियों को ढूँढ-ढूँढकर पीटा गया। उसके बाद, पुलिस ने उन्हें हवालात में बंद कर दिया।
मूढ़ को सारी समस्या की जड़ बताकर उस पर कार्रवाई हुई। सभी ने मिलकर फैसला किया कि उसकी मानसिक स्थिति ठीक नहीं है। उसे मानसिक अस्पताल में भर्ती कराया जाना चाहिए।
दो दशक बीत गए। मूढ़ अब प्रौढ़ हो चुका है। वह पूरी तरह भूल चुका है कि वह कभी तर्क करता था। वह शुद्ध गदर्भ में रूपांतरित हो चुका है। अब, जब भी कोई प्राणी उसे तर्कपूर्ण बात करता दिखाई देता, वह उसके पास पहुँच जाता और जोर-जोर से चिल्लाना शुरू कर देता है –
“ढेंचू-ढेंचू! ढेंचू-ढेंचू! ढेंचू-ढेंचू! ढेंचू-ढेंचू!”


Well written ! 🙇🏻
So so so thoughtful 👏👏👏👏