बेटों वाली
A story of domestic violence and moral rot — an attempt at Premchand meets Stephen King.
गोरको की आँखों में नींद आज रत्ती भर न थी। बुढ़ापे में नींद का सुख कुछ खास वैसे भी न था। किन्तु जब भी महीने की पहली तारीख नज़दीक होती, नींद का बैर जैसे चरम पर होता।
गोरको कभी छत पर खटिया बिछा कर सोने की कोशिश करती, कभी नीचे बरामदे में। पंखा चलने पर ठंढ सी लगती, बंद करते ही गर्मी। रात अपने तीसरे पहर में थी। चलो, कुछ ही घंटे की बात है अब। थोड़ी देर में मंदिर से घंटी की आवाज़ आने लगेगी।
गोरको की उम्र क्या थी, उसे याद नहीं। हाँ बड़े बेटे की उम्र पचास साल थी, ये याद था। सबसे बड़ा पोता इस साल बीस का होने आया था। उसे पोतों से मिले अरसा हो गया था, लेकिन सबके जन्म दिन और साल अच्छे से याद थे।
पति को गुजरे हुए छः साल हुए थे। तब से यह मुसीबत गोरको के सर आ पड़ी थी। हर महीने की पहली तारीख को उसे पति की पेंशन मिलती। वो जो उसके गुजारे का साधन भी था, और मुसीबत का भी। उसके दोनों बेटे पास के शहर से आ जाते।
“बुढ़िया ! इस उम्र में तू इतने पैसों का क्या करेगी? कुछ पोते-पोतियों के बारे में भी सोच। हमारे बच्चे का बढ़िया स्कूल में पढ़ना जरूरी है की तुम्हारी ऐयाशी?”
गोरको को लगता - दो वक़्त चाय और तीन वक़्त का खाना कब से ऐयाशी हो गया ? साल में एक दो बार वो गाँव के ही एक कपडे दूकान से सूती की साडी ले लेती। गाँव की एक स्कूल जाने वाली लड़की को मान-मनौवल कर, हज़ार रूपये महीना पर रखा था। घर के काम और दो समय का खाना बनवा लेती थी।
ये नाशपीटे चाहते हैं मैं खाना बंद कर दूँ? जब भी अपने पोतों का मुँह देखना चाहती हूँ, ये कहते हैं - पांच हज़ार दे, तो पोते से मिलना - खाली हाथ मिलेगी क्या ? अब दादी-पोते का रिश्ता भी धंधा बन गया ?
आखिरी बार इन्होने मुझे कब त्यौहार की मिठाई ला कर दी या कभी एक साडी - मुझे याद भी नहीं। हर बार एक तारीख को अगर मैं गाँव वालों के सामने हंगामा न करूँ, तो ये मुझे खाने के भी पैसे न छोड़ें। इतना हंगामा करने के बाद भी तो ज़्यादातर रकम ये ही ले जाते हैं। पति के मरने पर सारी रकम तो ले गए। अब तो मुझे शांति से जीने दें।
गोरको को अपने गुजारे की रकम जाने का भय तो था, साथ ही बेटों के अपयश का भी। बेटों की बदनामी में उसकी बदनामी भी तो थी। पिछली बार जब बड़ी बहू ने उसे बाल पकड़कर ज़मीन पर पटक दिया था, उसे मूर्छा सी आ गयी थी। बावज़ूद, ये बाद किसी को बताई नहीं थी। पर दिनों दिन शरीर पर पड़े निशान छुपाने मुश्किल हो रहे थे। आंखों के नीचे काला दाग अब तक था। इस चोट ने उनकी रही सही रौशनी भी छीन ली थी।
शाम होने को आयी, मगर कोई आया नहीं। उसे सुकून था तकलीफ और ज़लालत से बचने का, पर इस महीने शायद अपने बेटों का मुंह न देख पाए। गोरको सोचे जा रही थी - कैसी माँ थी वो जो आज अपने ही बच्चों का मुख न देखना चाहती थी। इन्ही ने तो उसे बेटों वाली होने का सुख दिया था। कैसे पुए बांटे थे इनके पैदा होने पर। आ जाते तो कम से कम पोते-पोती की खबर तो मिल जाती। मैं भी कितनी स्वार्थी हूँ - इस उम्र में अपने बारे में सोच रही हूँ। सारे पैसे इनको दे के मैं गाँव के मंदिर में भी तो रह सकती हूँ। चार दिन बचे हैं, राम के चरणों में बिता ही सकती हूँ।
वो देवी जी को शाम का दिया दिखा के लौटी ही थी कि छोटे बेटे ने घर के दरवाजे से कदम रखा। हृष्ट-पुष्ट, छः फुट का जवान। उम्र कोई चालीस साल। नशे में धुत्त। गोरको का सारा पश्चाताप जाता रहा। उसने सहमी आवाज़ में कहा - “कौन. . . पंकज ? इतना देर से क्यों आया . . . खाना लगा दूँ बेटा ? तू पहले आता तो तेरा भी खाना बनवाती। चल तू खा ले। मैं अपने लिए कुछ और बना लेती हूँ।”
बेटे ने कुछ न कहा। वो बस दालान पर लगी चौकी पर बैठ गया - पालथी मार कर। गोरको समझ गयी - खाना ला कर रख दिया। चार रोटी, दाल, सब्ज़ी, टमाटर-खीरे का सलाद, और एक गिलास दूध।
गोरको अंदर रसोई में गयी और आंटा गूंथना शुरू किया। उसका दिल धौंकनी बना था - पता नहीं ये पगला क्या करे ? इतने बड़े घर में अकेली थी। दिन का समय होता तो चार लोग होते भी दालान पर। तभी उसे पंकज की आवाज़ सुनाई दी -
“बुढ़िया को रोज़ दूध, घी चाहिए। कोई फ़िक्र नहीं कि पोते को दूध मिलता है कि नहीं ?”
गोरको चौंक के पीछे मुड़ी - पंकज एकदम पास आ खड़ा हुआ था। ज़बान लड़खड़ा रही थी, जैसे उसको मुंह का लकवा था। डर से गोरको सफ़ेद पड़ गयी।
उसके मुंह से बस इतना निकला - “बेटा। उनको मेरे पास छोड़ जा कुछ दिन के लिए। जो मैं खाती हूँ, उनको भी खिलाऊंगी।”
“अरे बुढ़िया ! अगर तुम्हारे पास छोड़ दूँ, तो जो हज़ारों की फीस भरता हूँ स्कूल की, वो नुक्सान कौन भरेगा ?”
“अरे बेटा ! तो मैं कितने चीज़ों की परवाह करूँ ? मेरी तो अब राम के पास जाने की उम्र हो गयी है। अब तो सब तेरी ज़िम्मेदारी है न बेटा ? मैं तो तुमसे कुछ न माँग रही। तुम कम से कम अपना परिवार तो संभाल ही सकते हो ? जवान आदमी हो। ”
“हाँ बुढ़िया। जवान आदमी हैं। ये देख जवानी। ” - कहते पंकज ने गोरको को बालों से पकड़ा, और एक ज़ोर का झटका दिया।
गोरको को लगा जैसे आसमान सर पर आ गिरा। मुंह से कोई चीख न निकली। देखा - सफ़ेद-काले बालों का एक गुच्छा पंकज के हाथ में था। गोरको की आँखों से आंसू निकल पड़े। वो ज़मीन पर गिर पड़ी थी। कमज़ोर घुटनों ने साथ न दिया। वो उठ के तुरंत भाग न सकी। आँखें पत्थर हो गयीं। बड़ी कोशिश के बाद आवाज़ निकली -
“मत कर बेटा ! अपयश लगेगा।”
पंकज पर जैसे खून सवार था। कभी बाल खींचता, कभी चेहरे पर मुक्के, तो कभी लात।
गोरको का कंठ रुंध चूका था। आँखें गंगा-जमुना। बंद गले से बस गूंगी आवाज़। ये सिलसिला कब तक चला - न पंकज को पता चला, न गोरको को। बंद तब हुआ जब गोरको के गले की गूंगी आवाज़ भी बंद हो गयी - पंकज पसीने से तरबतर।
पंकज बाहर दालान पर आया। खाना ठंढा हो चुका था। मेहनत ने उसे थका दिया था, अब वो भूखा था। उसने फटाफट खाना ख़तम किया, दूध का गिलास खाली। हाथ धो कर वो वही दालान में चौकी पर पसर गया।
सुनील आज गाँव नहीं जा पाया था। कुछ बीस साल पहले वो गाँव से शहर आया था। अपने बेटे के जन्म के ठीक बाद। जब उसे आधी रात को अपनी बीवी को प्रसव पीड़ा के बाद शहर के अस्पताल ले जाना पड़ा था, उसने शहर में ही रहना मुनासिब समझा। उसने ट्यूशन पढ़ा कर अपना और परिवार का खर्च निकालना शुरू किया। परन्तु वो पूरा न पड़ता था। वो पापा से मदद मांगता। गोरको के हस्तक्षेप पर मदद मिलती, पर खरी खोटी के साथ - “उम्र हो गई, पर अपना परिवार भी नहीं चला पा रहे। समय था कि ये हमारा खयाल रखते, पर हमारा ही खून चूसने पर आमादा हैं। ”
बीवी अक्सर पैसे को लेकर झगड़ पड़ती - जब औकात नहीं तो सब को लेकर शहर क्यों आये ? वो चिड़चिड़ा होने लगा।
समय-असमय वह अपना आपा खो बैठता। बुढ़िया को अपमाजनक शब्द कहना, उसके रसोई के बर्तन फेंक देना, घर के शीशे तोडना, आम बात हो गयी थी। हालांकि वो हाथ उठाने से कतराता था, लेकिन पत्नी और पंकज ने वो हद भी पार कर दी थी। माँ पर दोनों अक्सर हाथ उठा देते थे। पत्नी ने बच्चों का त्योहारों पर गाँव जाना या अपने सास का अपने घर आना बंद करा दिया था।
पहले तो पंकज सुनील का विरोध करता था - “भैया! आपकी पत्नी और आपके बच्चे आपकी ज़िम्मेदारी हैं। माँ-पापा को अपना रिटायरमेंट चैन से काटने दीजिये। ”
लेकिन जब उसके भी दो बच्चे हुए और वो भी उसी शहर में आ के रहने लगा, वो भी हर एक तारीख को गाँव आने लगा था। पीने के बाद वो होश खो बैठता था। वो सब से झगड़ पड़ता था - गाँव के लड़के, सुनील, माँ-पापा। उसकी कद-काठी देखकर लोग उससे उलझते नहीं थे।
सुनील अक्सर ये सोचता - ये दानव उसने ही खड़े किये थे। अकेली बूढी औरत पर उसे दया भी आती थी। लेकिन जब बढ़ते बच्चों को देखता और स्कूल फीस, बस का किराया, मकान का किराया देने की तारीख नज़दीक आने लगती, उसकी रातों की नींद उड़ने लगती। वो अगले महीने फिर गाँव जाने का निर्णय करता।
आज उसकी बेटी बीमार थी। काफी थक हार कर वो अस्पताल से घर आया था। पति-पत्नी ने जैसे ही घर का दरवाजा खोला - एक बड़ा सांप रेंगता हुआ अंदर से निकला, छः फुट से ऊपर लम्बा, काला-विकराल। तीनों के सम्मुख फन फैलाये ऐसे खड़ा था, जैसे कोई चेतावनी दे रहा हो। पत्नी, बेटी ज़ोर से चिल्लाये। सुनील स्तब्ध खड़ा रहा कुछ क्षण। फिर समझ दिखाते हुए पत्नी और बेटी को ले धीरे-धीरे पीछे हटने लगा। जब उनके बीच काफी दूरी हो गयी - सांप धीरे से लेटा और सरक कर गली की नाली में गायब हो गया।
सुनील ने पत्नी-बेटी को बाहर खड़ा कर अंदर प्रवेश किया। अंदर का दृश्य देख उसकी आत्मा काँप गयी । रसोई से लेकर बिस्तर तक छोटे-बड़े हज़ारों साँपों ने कब्ज़ा जमा रखा था। उनकी जीभ बाहर लपलपा रही थी, उनकी मिश्रित हिस्स ऐसी ध्वनि पैदा कर रही थी, जैसे हाई वोल्टेज बिजली के तार कहीं आस पास हों। हवा में तीव्र दुर्गंध थी - जैसे शमशान में लाश जल रही हो। सुनील के पैर ज़मीन में जैसे जम गए थे। वो न आगे जा पा रहा था, न पीछे। उसके कंठ से आवाज़ भी न निकल रही थी।
तभी उसका फ़ोन बज उठा। सारे साँपों ने एक साथ सुनील की ओर देखा। सुनील की रूह काँप गयी। उसने मुड़कर भागने की कोशिश की - पर उसके पैर ज़मीन से न उठे। सारे साँप अब एकदम पास आ चुके थे, उसके चारों ओर एक गोला बना कर खड़े हो गए - बित्ते भर की दूरी पर।
चारों ओर एक के ऊपर एक जैसे साँपों की एक दीवार खड़ी थी - फन उठाये हुए - जीभ लपलपाते हुए - हिस्स की निरंतर आवाज़ के साथ। सुनील को उस दीवार के भीतर से एक चेहरा दिखा - उसकी माँ का। उसके माथे के बीच-बीच में केश उखड़े हुए थे। चेहरे पर गहरे नीले निशान थे। आँखों के नीचे काले दाग। लाल सुर्ख आँखें - जैसे अंगारे।
सुनील भय और आश्चर्य से देख ही रहा था कि अचानक वो चेहरा धू-धू कर जल उठा।
सुनील ने पूरी ताकत लगी दी और ज़ोर से चिल्लाया।
सुनील अब नींद से जाग चुका था। पसीने से तरबतर। दिल की धड़कनें जैसे राजधानी एक्सप्रेस। देखा उसका फ़ोन बज रहा था। फ़ोन करने वाले का नाम स्क्रीन पर था - पंकज।
उसने फ़ोन उठाकर कान से लगाया। उधर से आवाज़ आयी - “भैया! माँ नहीं रही। ”
सुनील अभी तक एक भयानक स्वप्न के प्रभाव में था, उसपर ये खबर। उसके मुंह से एक शब्द न निकला।
पंकज एक सुर में बोलता रहा - “पता नहीं भैया। हमको कुछ याद नहीं। हम कल बहुत दारु पी लिए थे। हम तो खा के दालान पर सोये थे। भोर में नींद खुली तो देखा माँ रसोई में इस हालत में थी। शरीर पर बहुत जगह सूजन था, और नीले निशान। माथा का बहुत सारा केश नोंच के ज़मीन पर बिखरा हुआ था। शायद रात भर छटपटाई, लेकिन उठने या चिल्लाने की हालत में नहीं थी।”
दोनों को आगे न कुछ कहने, न कुछ सुनने की जरूर थी। दोनों समझ गए थे, क्या हुआ था।
सुनील जब तक गांव पहुंचा, दोपहर हो चुकी थी। गांव के काफी लोग जमा हो चुके थे। वो पंकज की मदद कर रहे थे, शव को शमशान ले जाने के लिए। आज आसमान में घने काले बादल थे। पास के बरगद के पेड़ को काले कौओं ने ढँक रखा था। यह झुंड लगातार काँव-काँव किये जा रहा था।
सुनील को देखते ही एक औरत बोल पड़ी - ऐसी दर्दनाक मौत भगवान तुम दोनों को भी दे। पंकज चिल्ला उठा - चुप कर बुढ़िया।
सुनील अर्थी के पास पास पहुँचा। हवा के झोंके ने शव के ऊपर रखा कफ़न हटा दिया - सुनील को माँ का चेहरा दिखा। सुबह का सपना उसकी आँखों के सामने किसी फिल्म के दृश्य की भांति चल पड़ा। उसने आँखें फेर ली। मरी हुयी माँ का सामना करने की भी हिम्मत उसमें नहीं थी।
पंकज ने झट से आगे बढ़ कफ़न वापस ठीक किया। एक व्यक्ति को उसने दबी आवाज़ में कहते सुना - “राम-राम ! कैसे कपूत मिले गोरको को ? अपना परिवार जवानी में ठीक से न चल रहा । माँ-बाप ने पहले इन दोनों को बड़ा किया। बुढ़ापे में अब इनके औलादों को भी पाले ? कलियुग चरम पर है।”
लोगों ने खुसुर-पुसुर शुरू कर दिया था। लेकिन खुल कर बोलने की हिम्मत किसी में न थी। अब तो हंगामा करने के लिए गोरको भी न थी। वो गाँव जिसने बुढ़िया की जीते-जी मदद न की, उसके मरने पर पर अब बेटों का चरित्र आकलन करने में लगा था।
थोड़ी देर में अर्थी को शमशान ले जाने की बारी आयी। पंकज ने आगे बढ़कर एक कोने से बांस का छोर पकड़कर उठाया। पहले एक हाथ से - अर्थी टस से मस न हुयी। पंकज चौंका। उसने फिर प्रयास किया - वही परिणाम। अब सबका ध्यान इस तरफ गया। पंकज ने आँखें नीची की - दोनों हाथों से ज़ोर लगाया।
पंकज को अपने पुष्ट शरीर और जवानी पर बड़ा गुमान था। माँ का अंतिम वीभत्स चेहरा सामने आ गया। लगा जैसे माँ ने उसका हाथ पकड़ लिया - “कल तो जवानी दिखा रहे थे बेटा - आज क्या हुआ? मेरी ही छाती का दूध पीकर तो ये ताकत आयी थी। एक बुढ़िया के कमजोर शरीर के सामने जवानी दिखाना तो शरीर के क्षय होने की निशानी है न बेटा। ”
पंकज पसीने में सराबोर हो गया । लगा उसके पैरों को लकवा मार गया हो। वो वहीं पर धम से बैठ गया। सर उठाकर देखा, पुरे गाँव की नज़रें उसी पर थी। ये चुभती नज़रें उससे बर्दाश्त न हुयी। उसने अपना सर घुटनों के बीच छुपा लिया।
किसी और की हिम्मत न हुई, अर्थी को हाथ लगाने की।
गाँव के पुजारी की सलाह पर - गोरको की चिता सजी - उसके अपने आँगन में।
तेरहवीं तक पंकज और सुनील बीवी-बच्चों के साथ पड़ोसियों के यहाँ रहे। उसके बाद घर को ताला लगा शहर वापस चले गए।
उस दिन के बाद से पंकज का शरीर जैसे गलना शुरू हो गया। साल भर के अंदर वो सुख कर हड्डियों का ढांचा हो गया। आँखों के नीचे गहरे काले गढ्ढे।
सुनील अक्सर रातों को चीख कर जाग उठता। उसकी हालत अब ट्यूशन पढ़ाने की नहीं थी। उसकी बीवी आस पड़ोस के छोटे बच्चों की देखभाल कर घर चलाती थी।
गोरको चैन की नींद सो रही थी - अपने घर में - हमेशा के लिए। अब कोई पहली तारीख को परेशान करने न आता था।


Unsettling but a good read. Thanks for writing
Well written...it brought out emotion of helplessness of the mother so beautifully. It was uncomfortable to read but it really depicts reality